Description
दो शब्दसारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ।।वरदा विद्याविहारिणी सरस्वती के वरदपुत्र कविकुलचूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदासजी ने प्रलयकारी जी के दिशानिर्देश में भगवान् भूतनाथ शशांक शेखर शिवजी के द्वारा अनादिकाल में ही विरचित मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्र के परम-पावन चरित्र की यशोगाथा को भक्तशिरोमणि वीरवर श्रीहनुमान् जी के अवधी भाषा में भाषाबद्ध करके पूर्ण मर्यादित ढंग से विश्वविश्रुत अप्रतिम ग्रन्थ श्रीरामचरितमानस की रचना की। इस महान् ग्रन्थ में चार वेद, छः शास्त्र, आष्टादश पुराण, निगमागम, उपनिषद् तथा अन्यान्य धर्मग्रन्थों का समन्वय अलौकिक ढंग से सजाकर जहाँ श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया, वहीं इसमें डूबने-उतराने के लिये विद्वानों एवं ज्ञानियों को वाध्य भी कर दिया।अनेकानेक सनातनी धर्मग्रन्थों एवं सन्तों के मत को अपने में सैंजोये हुए यह श्रीराम-कथा निश्चय ही अपने-आप में भगवान् श्रीराम का चरितरूपी महासिन्धु है, जिसे पार पाना लौकिक जगत् के प्राणिमात्र के लिये दुष्कर ही नहीं, असम्भव है। श्रीरामचरितमानस पर अब तक अनेकानेक टीकाएँ, समालोचनाएँ एवं शंका- समाधानात्मक ग्रन्थ प्रकाशित हो गये हैं। अतः मैं यह नहीं कह सकता कि इस ग्रन्थ में सब कुछ नया है, फिर भी जो शंकाएँ सामने आयीं, उनका समाधान करने का अथक प्रयास किया है, मेरा यह लघुतम प्रयास है। जन-सामान्य द्वारा उठायी जा सकने वाली छोटी से छोटी शंका के भी शास्त्रीय प्रामाणिक निराकरण इस श्रीराम-कथा से आप को मिल सकेंगे।




